संपूर्ण
विश्व एखन एक महामारीसँ लड़ि रहल अछि। ई संकट कोनो एक देशपर नहि समूचा मानवता पर
मड़रा रहल अछि। मुदा, मानवता अंततः ई युद्ध जीतत,
एहिमे कोनो दू-मत नहि। कारण आजुक मानव एहन युद्ध जीतबामे सक्षम अछि।
अतः प्रश्न एखन जतेक पैघ छैक जे ई महामारी रूपी काल कोना कटत, ताहिसँ पैघ प्रश्न छैक जे ई महामारीसँ हमरा लोकनि जखन अगिला किछु दिनमे
उबरब तखन आगाँक बाधा-विघ्नक पार कोना पायब? आइ संसारक विचारक
एहिपर मंथन कए रहल छथि। मुदा, हमरा लोकनि, भारतक जनता ओ व्यवस्था, निचैन छी जे - जे जखन हेतैक से तखन देखल जेतैक! ई सोच हमरा लोकनिक
लेल कतेक सहायक, कतेक विपत्तिकारी होयत से भविष्यक गर्भमे
अछि।
महामारी
पसरबासँ पूर्वहुँ प्रायः हमरा लोकनि, हमर
शासन-व्यवस्था, यैह मनःस्थितिमे रही आ आइ तकर परिणाम भोगि
रहल छी। संपूर्ण देशमे तालाबंदी लागू अछि। जँ ससमय सचेत रहितहुँ तँ आइ स्थिति
दोसरो भए सकैत छल। तालाबंदीक टटका असरि बड़ सकारात्मक छैक- महामारी पर हमरा लोकनि
नियंत्रण पायब। वर्तमान परिस्थितिमे यैह सभसँ प्रभावकारी दबाइ थिक। मुदा, एकर दुष्परिणाम कदाचित ताहूसँ बढ़ि कऽ हमरा लोकनिक सोझाँ आओत। आइ विशेषज्ञ
लोकनि अंदाज लगा रहल छथि जे मंदीक चपेटमे आबि कऽ भारतक कमसँ कम चारि आना उद्योग
बंद भए जयतैक, आ बेरोजगारीक विकराल समस्या एतुका समाजमे
पसरत। मुदा ई जे आगत समस्या अछि ताहिसँ लड़बाक लेल हमरा लोकनि कतेक तैयार छी,
केहन
तैयारी कए रहलहुँ अछि, की ताहि सम्बन्ध
भारतवासी चिन्तन कए रहल छथि? एखनधरिक सूचनासँ तँ तेहन सन
किछु नहि लागि रहल अछि!
समाधान
तकबाक लेल समस्यासँ साक्षात्कार आवश्यक अछि आ समस्यासँ साक्षात्कार करब, करायब, नकारात्मकता नहि थिक। यदि कतहु
विश्व-कल्यानार्थ यज्ञ होइत हो आ ओहि यज्ञमे किनको कोनो अभाव खटकैत छनि, तथा ओ ओहि अभाव दिस आयोजनकर्ता लोकनिक ध्यानाकर्षण करबैत छथि तँ तकरा
सहयोग बूझल जयबाक चाही, छिद्रान्वेषण नहि। तहिना यदि हमरा
लोकनि एखन देशक कल्यानार्थ कोनो मुहिममे लागल छी आ देशवासीक एक समूहकेँ लगैत छनि
जे हमरा लोकनिक प्रयासमे कोनो कोताही अछि अथवा कोनो प्रयास अनावश्यक अछि तँ से
देशद्रोहक श्रेणीमे कोना आबि जायत? यदि एहन वर्गीकरण हुअय
लागत तँ फेर सामुहिकता कोना बाँचत? सामुहिकता बचयबाक सभसँ
अधिक दायित्व बहुमतक होइत छैक।
विगत
किछु वर्षमे भारतीय समाजक ताना-बाना बहुत बदललैक अछि। आ एहि बदलावक सकारात्मक ओ
नकारात्मक परिणाम सेहो हमरा लोकनिक सोझाँ अछि। सभसँ पैघ सकारात्मक बदलाव हमरा जे
नजरिपर अबैत अछि से थिक जे हमरा लोकनि आब एक मजबूत राष्ट्रक वासीक रूपमे पहिनेसँ
अधिक गौरवबोध कए रहल छी मुदा तहिना नकारात्मक परिणाम ई नजरि अबैत अछि जे ई गौरवबोध
आस्ते-आस्ते हमरा लोकनिकेँ अनावश्यक अहंकारमे सेहो ठेलने जा रहल अछि। खास कए जहिना
जातीय एकता सुदृढ़ भेल अछि तहिना विजातिक प्रति पूर्वाग्रह ओ घृणाबोध सेहो बढ़ल
अछि । हमरा लोकनि व्यक्ति रूपमे आब कम सोचैत छी आ सामुहिक रूपें अधिक। समूहमे रहब, सोचब नीक बात मुदा ताहिमे अपन व्यक्तित्वक महत्ता हेरायल जा रहल अछि। जहिना
सामुहिकता जरूरी तहिना व्यक्ति-स्वातंत्र्य सेहो। अन्यथा संपूर्ण विश्वमे ई
मानवाधिकारक एतेक गोलंजर किएक होइत?
काल्हि
भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा अपन दलक नेता आ कार्यकर्तासँ अनुरोध कयलनि ओ लोकनि
देशमे कोरोनाक प्रसार हेतु मात्र मुसलमानकेँ जिम्मेवार होयबाक बात नहि करथि।
अन्यान्य जिम्मेदार व्यक्ति सब सेहो बेर-बेर देशवासीसँ अनुरोध कए रहलाह अछि जे
बीमारीकेँ साम्प्रदायिकतासँ नहि जोड़ल जाए। मुदा एखनहुँ देशक एकटा पैघ वर्ग एहि
काजमे लागल छथि। आइ अखबारमे आयल अछि जे प्रशासन आब चिन्तामे पड़ि गेल अछि जे
देशवासीक एहन व्यवहारपर कोना नियंत्रण कयल जाय। हमरा लोकनि एखन आगाँ जाहि आर्थिक
संकटक सामना करयबला छी तकरासँ जुझबाक हेतु जाति-पंथ, धर्म-सम्प्रदायसँ
आगाँ मात्र मानव ओ मानवीयताक आधारपर सोचय पड़त। अन्यथा महामारीमे जतेक कष्ट
भोगलहुँ अछि तकर कतोक गुन अधिक कष्ट आगाँ भोगय पड़त। हमरा लोकनिक नागरिक कर्तव्य
बनैत अछि जे आइ मीडिया जाहि प्रकारें साम्प्रदायिक जहर देशमे पसारि रहल अछि,
तकरा रोकबाक हेतु सरकार पर दबाव बनाबी। पूर्वक साम्प्रदायिक तनाव
हमरा लोकनिकेँ महामारीसँ लड़बा काल सेहो पछाड़बे कयलक अछि। की ई प्रतिशोधक समय थिक
अथवा पुरना गलतीसँ सिखबाक? एखन टीवी पर समाचार अबैत छैक -
फलाँ ठाम एतेक नवका मरीज भेटल जाहिमे अमुक संख्या अमुक संप्रदायक। की ई हेडलाइन
ठीक छैक? की सोझे मरीजक संख्या बतायब पर्याप्त नहि होइतैक? की एना फरिछा कए हमरा लोकनिकेँ असल प्रश्न सभसँ कात नहि कयल जा रहल अछि?
सब पक्षपर विचार करब तखने कोनो नीक-अधलाहक निर्णय कए सकब।
सत्ता
आ सामर्थ्यवान सबदिन प्रजाकेँ अनुयायी रूपमे देखय चाहैत अछि। ओकरा हरेक प्रकारक
चुनौती अस्वीकार होइत छैक। ओ चाहैत अछि जे वर्षो-वर्ष ओकर पदवी कायम रहैक। आ तें ओ
नाना-प्रकारक तिकड़म सेहो रचैत रहैत अछि। प्रजाक कर्तव्य छैक जे ओ राजाक तिकड़ममे
अपन नफा-नोकसान चीन्हय। यदि प्रजा ई नफा-नोकसानकेँ पहिचान करबाक लूरि बिसरि जायत
तँ ओ स्वतः गुलाम बनि जायत। ओकरा लेल सत्ताकेँ कोनो जिंजिंर कि सैनिकक ओरियान नहि
करय पड़तैक। लोकतंत्रमे सेहो सत्ता-शासनकेँ जगायब, नागरिकक
दायित्व थिक। लोकतंत्रक मालिक आ रखबार दुनू केवल जनता होइत छैक, केवल जनता।
Published on FB 05.04.2020
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