माननीय सभाध्यक्ष महोदय, सभा में उपस्थित प्रबुद्ध साहित्यकार तथा साहित्यप्रेमीगण, आज आप लोगों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच स्वयं को पाकर गौरवान्वित और परम आह्लादित हूँ। मेरी कविता संग्रह "धरतीसँ अकास धरि" को साहित्य अकादेमी जैसी शीर्ष और प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ने 'साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार-2017" से नवाजा, इसलिये मैं साहित्य अकादेमी, निर्णायक मंडल एवं चयन प्रक्रिया में शामिल सभी व्यक्तियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। साथ हीं, आज मैं यह पुरस्कार उन सभी व्यक्तियों कों समर्पित करना चाहूँगा जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मेरी लेखन प्रक्रिया से सम्बद्ध रहे हैं अथवा सरोकार रखते हैं।
मैं क्यों लिखता हूँ, कैसे लिखता हूँ और किसके लिये लिखता हूँ? इन सभी प्रश्नों के जबाव के तौर पर मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि जब मेरे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता है, जिनके समक्ष मैं अपना मनोभाव व्यक्त कर सकूँ, किन्तु मन में उपजे विचारों की अभिव्यक्ति तत्क्षण अपरिहार्य सी लगने लगती है, तब मैं कलम उठाता हूँ, तभी मैं लिखता हूँ। चूँकि ऐसी अभिव्यक्ति
अधिकतर कविता का रूप धारण करती है, अतः कह सकते हैं- कविता मेरे एकांत की सहचरी है। कविता मेरे एकान्त की अभिव्यक्ति है। आज से अठारह वर्ष पूर्व मैंने जब लिखना प्रारम्भ किया तो यह महज शौकिया तुकबन्दी था। लेकिन आज लेखन मेरी आदत ही नहीं अपितु आवश्यकता बन चुकी है।
अधिकतर कविता का रूप धारण करती है, अतः कह सकते हैं- कविता मेरे एकांत की सहचरी है। कविता मेरे एकान्त की अभिव्यक्ति है। आज से अठारह वर्ष पूर्व मैंने जब लिखना प्रारम्भ किया तो यह महज शौकिया तुकबन्दी था। लेकिन आज लेखन मेरी आदत ही नहीं अपितु आवश्यकता बन चुकी है।
साहित्य ने मुझे भीड़ के बीच रहते हुये भी, भीड़ न बनने, भीड़ से अलग सोचने और जीने की कला सिखाया है। साहित्य साधना में, मैं एकाकी तो होता हूँ मगर अपने भीतर लोक और समाज को जीता हूँ। सुना है कि कविता लिखने के लिये, साहित्य सेवा के लिये सगे-संबंधियों को भी त्यागना पड़ता है। मुझे लगता है कि साहित्य के संसर्ग में आने पर ये सभ अनायास हीं छुटते चले जाते हैं। लेकिन मैंने यह भी अनुभव किया है कि कोई साहित्यकार, साहित्य का हाथ थामे, अनायास हीं अपने व्यक्तिगत संबन्ध-सरोकार से थोड़ा दूर भले चला जाय मगर सामाजिक सरोकार से उसका एक सर्वथा नवीन, जीवंत और विराट संबन्ध स्थापित हो जाता है। एक लेखक के तौर पर मैं कदाचित् समाज से अलग जीता हूँ, समाज से अगल सोचता हूँ मगर इतना निश्चित है कि हमेशा समाज के लिये जीता हूँ और समाज के लिये सोचता हूँ ।
साथियों, आज जबकि यहॉँ सम्पूर्ण भारतवर्ष से प्रतिनिधि रचनाकार उपस्थित हैं, मैं इस अवसर पर आपलोगों से अपने मन की कुछ बाते साझा करना चाहूँगा । हम जिस दौर के लेखक है, उस दौर में बहुत सारी पुरानी मान्यताएँ ध्वस्त हो चुकी है, नित नये मान्यताएँ और अवधारणाएँ आकार ले रहे है। अतः अत्यंत तीव्र गति से परिवर्तित होते जीवन-जगत को समझना, समाज को उसकी खूबियों तथा खामियों से ससमय अवगत कराना, हमारे लिये बड़ी चुनौती है।
आज हमे कई मोर्चो पर एकसाथ लड़ना पड़ेगा। एक तरफ जहाँ वैश्वीकरण के इस दौर में हमें अपनी संस्कृतिक समृद्धि और वैविध्य को संरक्षित रखने होंगे तो दूसरी तरफ विश्वमानव के रूपमे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के मर्यादा को भी अक्षुण्ण रखना होगा। यांत्रिक जीवन की यंत्रणा से मानव जीवन को अलग कर यथाशक्ति उसके भीतर उच्चतम जीवन आदर्श को स्थापित करना होगा। सांस्कृतिक पुनर्निमाण के प्रयास में हमे यह भी ख्याल रखना होगा की रूढ़ियों का अवलम्बन न हो। हमे धर्म मार्ग पर तो चलना ही है मगर धार्मिक विभ्रम में फंसकर विधर्मी होते मानव जाति को बचाने की चेष्टा करने होंगे। धार्मिक उन्माद और अतिवाद से विश्व को बचाना होगा। हमे इतिहास के पन्नों की फड़फराहट के बीच फंसे समाज को, वर्तमान को सुनने-समझने योग्य बनाये रखना होगा ताकि उसकी चेतना के आलोक में हमारी भावी पीढ़ी अपने इतिहास को और विश्वसनीय, और स्पष्ट रूप में पा सके।
कहना न होगा कि हम एक महान लोकतांत्रिक व्यवस्था के जिम्मेवार नागरिक हैं। अतः हमें लोकतांत्रिक मूल्यों, व्यक्ति-स्वातंत्र्य और विमर्श की विरासत को बचाने के लिये सचेत रहना होगा। स्थापित मान्याताओं, परम्पराओं तथा सिद्धान्तो के प्रति शंका अथवा असहमति का भाव सदैव मानव सभ्यता को विकास के पथ पर अग्रसर करता रहा है। अतः हमें वैचारिक भिन्नता, रचनात्मक मतभेद और विमर्श का दायरा बचाने और बढ़ाने के लिये भी लगातार संघर्षरत रहना होगा ।
साहित्य अकादेमी ने हमे जो सम्मान दिया है, यह वस्तुतः हमारी प्रतिभा की वह नई पहचान है जिस में अपने देश-समाज के प्रति रचनात्मक दायित्वबोध अंतर्निहित है । मुझे विश्वास है कि हमारे कर्तव्य-मार्गपर, यह अकादेमी और यह सम्मानित करने वाला समाज, हमें हर-संभव सहयोग प्रदान करेंगे ।
अंत में एकबार पुनः मैं आप सबों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ कि आपने आज मुझे यहाँ उपस्थित होने का अवसर दिया, एक नई पहचान दी । धन्यवाद।
(चंडीगढ़)
22-12-2017
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