Thursday, June 4, 2020


'विकास'क नामपर गामक 'नवगछुली'केँ बाजारवादक 'अमरलत्ती' जखन गछारने जा रहल अछि, गामक हरियरी कंक्रीटक तरमे पिचाय अकाले काल-कवलित भऽ रहल अछि, तखन ओतुका जिनगी' किछु हरियरीक लोभमे शहर दिसमलकैत अछि, ओतुका गली-कूचीमे गड़कैत अछि। मुदा गामक प्रति ओकर ममता, ओकर सिनेह ओकरा बेर-बेर घूरि तकबाक लेल विवश करैत छैक । शहरक प्रपंचकेँ गामक सोझमतिया सोहान्त कहाँ पड़ैत छैक, ओ तँ चट दऽ 'अँउठी पहिराय कऽ औंठा लऽ लैत अछि', गाम, शहरक जिरात भऽ जाइत अछि।

#_ग्लोबल_गामसँ_अबैत_हकार'_पढ़ैत
Posted on FB 10.06.2017
विद्यापति तथा हुनकहिसँ प्रभावित हुनक समकालिक ओ परवर्ती कवि लोकनिक पदावलीक अवलोकन कयलापर मध्यकालीन मैथिली भाषाक एकगोट विशिष्टता सोझाँ अबैत अछि जाहिमे संस्कृत छन्दशास्त्रक नियमसँ फराक, मैथिलीक विशिष्ट उच्चारण पद्धतिसँ प्रेरित तथा छन्द-रक्षार्थ, अनेक ठाम दीर्घ स्वर (अर्थात् आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि) केँ आवश्यकतानुसार कखनो दीर्घ तँ कखनो लघु वर्णक रूपमे प्रयोग भेल अछि । जार्ज ग्रियर्सन अपन मैथिली क्रिस्टोमेथीमे, नगेन्द्रनाथ गुप्त विद्यापति पदावलीक भूमिकामे तथा सुकुमार सेन ब्रजबुलिक भाषा-बैशिष्ट्यपर चर्चाकरैत एहि तथ्यकेँ रेखांकित कयलनि अछि ।

खासकऽ समकालीन मैथिली गजलक परिप्रेक्ष्यमे उपरोक्त सन्दर्भ बहुत महत्वपूर्ण बुझना जाइत अछि । मैथिली गजलक बहर-संरचनामे एहिसँ सहजता आबि सकैत छैक तथा गजलक भाव बोधमे, ओकर सरसताक वृद्धि भऽ सकैत छैक ।

एहि बीच Rajeev Ranjan Mishra सँ कतोक बेर विमर्श भेल जे स्थापित नियमानुसार बहर ओ लयात्मकतामे बहुत ठाम अन्तर्विरोध उत्पन्न होइत अछि । मुदा, हमरा जनैत एहन बहुत रास अन्तर्विरोध उपरोक्त परम्परा-पालनसँ स्वतः समाप्त भऽ सकैत अछि । एहिसँ इहो सम्भव थिक जे आइ जे गजल बहर-विहीन घोषित अछि सेहो बहर-विधानक अनुरूप प्रतिष्ठित हुअय आ मैथिली गजल-परम्परा आर समृद्धिशाली बुझाय आ निकट भविष्यमे मैथिली गजल उर्दूए-हिन्दीएक गजल जकाँ नव स्वर-नव त्वराक संग उपस्थित हुअय । तेँ आवश्यकता अछि जे गजलक व्याकरणपर काज कयनिहार लोकनि, मैथिली छन्दशास्त्रक विधान देनिहार लोकनि आ भाषा विज्ञानी लोकनि एहिपर समुचित विमर्श करथि।

Posted on FB 05.01.2017

Friday, November 23, 2018

समकालीन मैथिली साहित्य

मैथिली, भौगोलिक दृष्टि से भारत से नेपाल तक विस्तृत मिथिला भू-भाग की भाषा है तथा भारत के बिहार एवं झारखण्ड प्रदेश के उनतीस जिलों में तथा नेपाल के लगभग तेरह जिलों मे मुख्यतः बोली जाती है । दोनों देशों मे करीब सात करोड़ लोग मैथिली भाषा-भाषी हैं । आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच मैथिली भाषा का महत्वपूर्ण स्थान है । भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार भारोपीय भाषान्तर्गत मागधी प्राकृत की अपभ्रंश से उत्पन्न भाषाओं- मैथिली, असमिया, ओड़िया तथा बंगाली के बीच मैथिली प्राचीनतम भाषा है । सातवीं-आठवीं सदी में स्वतंत्र भाषा के रूप मे मैथिली का जो विकास हुआ वह ग्यारहवीं-बारहवीं सदी आते-आते अत्यंत परिष्कृत होकर सामने आया । मैथिली भाषा के इस आदिकालीन विकास यात्रा का सहज अनुमान ज्योतिरीश्वर ठाकुर रचित 'वर्णरत्नाकर' मे प्रयुक्त भाषा से लगाया जा सकता है । चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी में विद्यापति की रचनाओं के बल पर इस भाषा की लोकप्रियता शिखर पर पहुँच गई । आज मैथिली संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज हो चुकी है तथा नेपाल में इसे द्वितीय राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त है ।
सिद्ध साहित्य अथवा चर्यापद, डाक एवं घाघ वचनावली, प्राकृत-पैंगलम में प्रयुक्त मैथिली पद एवं ज्योतिरीश्वर कृत धुर्तसमागम नाटक तथा वर्णरत्नाकर नामक गद्य-ग्रन्थ मैथिली भाषा की प्राचीनतम साहित्य है । विदित हो कि वर्णरत्नाकर आधुनिक भारतीय भाषाओं उपलब्ध प्राचीनतम गद्य-ग्रंथ भी है । इस ग्रंथ की भाषा-शैली देखकर  प्रतीत होता है कि इससे पूर्व भी प्रचूर मात्रा में रचनाएँ अवश्य हुई होगी, कारण इस ग्रंथ की भाषा अत्यंत विकसित है ।
मैथिली साहित्य का मध्ययुग वस्तुतः विद्यापति युग है । कारण इस युग मे विद्यापति सबसे समर्थ रचनाकार हुए तथा समस्त पूर्वांचल में व्याप्त उनकी लोकप्रियता उन्हे निर्विवाद युगपुरुष बना दिया । मध्ययुगमे जब इस्लामी आक्रमण से आक्रांत भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक सुरक्षा हेतु संघर्षरत था, मिथिला के लोग अपनी सांस्कृतिक परिचिति की सुरक्षा हेतु अन्तर्मुखी हो गये थे । इसी क्रममे यहाँ परम्परागत धार्मिक मान्यताएँ एवं सभ्यता-संस्कृति आधारित आचार-विचार के पुनर्निधार्णन का प्रयास होने लगे । इस सामाजिक पुनर्संगठन मे विद्यापति तथा उनके पूर्वजों ने बहुमूल्य योगदान दिया । मगर जिन रचनाओं ने विद्यापति को युगपुरुष के रूप में स्थापित किया वह हैं उनकी पदावली । यहीं असंख्य गीति विद्यापति को मिथिला तथा इसके समीपवर्ती अन्य प्रदेशों में आश्चर्यजनक रूप से प्रतिष्ठित किया । विद्यापति के गीति की लोकप्रियता तथा समकालीन और परवर्ती साहित्यकारों पर उसके प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि परवर्ती चार सौ वर्षों तक रचनाकार उनके काव्य-परिपाटी का अनुसरण कर रचनाएँ करते रहे, मैथिली तथा स्थानीय भाषाओं के मिश्रण से बंगाल, असम तथा ओड़िसा में एक कृत्रिम भाषा-ब्रजबुलि का निर्माण हुआ । मध्ययुग में कविकोकिल विद्यापति पूर्वी भारत की लोकभाषाओं को साहित्यिक भाषा की स्तर तक पहुँचाने वाले प्रथम रचनाकार हुए ।  उनके मैथिली पदों का गांभीर्य, अनुभूति सघनता, संगीतात्मकता, तथा भाषायी सरलता उसे कालजयी बनाती है ।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मैथिली साहित्य विद्यापति के प्रभाव से मुक्त होने लगी तथा इस में आधुनिकता का प्रवेश होने लगा ।  यह कालखण्ड भारत हीं नहीं अपितु विश्व-इतिहास के लिये भी अत्यंत महत्वपूर्ण था । सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक आदि जीवन के हरेक क्षेत्र में इस समय परिवर्तन की गहमा-गहमी थी । भारतीय समाज पाश्चात्य विचारधारा से सम्पर्कित हुआ फलतः यहाँ बौद्धिक विकास की दृष्टि को गति मिला । वैज्ञानिकों ने प्रकृति का गहन अध्ययन-अनुशीलन कर मानवोपयोगी साधन का आविष्कार किया । नवीन सोच और बौद्धिकता के आगे समाज में व्याप्त रूढ़ीवादी विचार निष्प्रभावी होने लगी । वैज्ञानिक विकास ने औद्योगिक क्रान्ति का बीजारोपण किया । परिणामस्वरूप उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद का विस्तार होने लगा । प्रतिक्रिया स्वरूप समाज में नवजागरण आई और देश में स्वाधीनता आंदोलन का आरम्भ हुआ ।
उन्नीसवीं शतक के अन्तिम चरण मे नवजागरण की लौ मिथिला में पहुँची तथा बीसवीं सदी के आरम्भ तक समाज पर इसका स्पष्ट प्रभाव भी दिखने लगा । मानव सभ्यता के इतिहास में खासकर भारतीय परिप्रेक्ष्य में बीसवी सदी का आगमन ऐसे वातावरण में हुआ जब यहाँ के लोग अपनी नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ नया करने, कुछ नया रचने के लिए छटपटा रहे थे । इस छटपटाहट की पृष्ठभूमि में थी पारम्परिक जड़ता से मुक्ति की आकांक्षा और स्वातंत्र्य चेतना । इसी संक्रमणकाल में  मैथिली पत्रकारिताक का आरम्भ हुआ तथा इसके माध्यम से मैथिली साहित्यकारों ने सामाजिक जड़ता पर प्रहार शुरू किया । साथ हीं उन्होने राष्ट्रवादी चेतना को स्वर दिया, अंग्रेजी हुकूमत के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध समाज को जगाने का अभियान चलाया । कथा, कविता, उपन्यास, निबंध समेत प्रायः सभी विधाओं में इस समय समाज मे व्याप्त परम्परागत रूढ़ि-भंजन तथा प्रगतिकामी समाज के निर्माण हेतु लेखकों ने पृष्ठभूमि तैयार करना शुरू किया ।
जब भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन अपने चरम पर था, तभी मैथिली साहित्यधारा में नये-नये सामाजिक सरोकार का समावेश होने लगा। अन्यान्य भाषाओं की तरह मैथिली साहित्य में भी नये विचारधाराएँ मुखरित हुई, जो छायावादी, प्रगतिवादी और प्रयोगवादी प्रवृति के रूप में पश्चात विकसित होते गये । देश की राजनीतिक, धार्मिक मान्यता, अर्थव्यवस्था, सामाजिक ओ मानवीय मूल्यों में जो परिवर्तन आये, साहित्यिक पटल पर उसका चित्रण अवश्यंभावी था । इसी क्रम में युगीन जटिलता, अंतर्विरोध, वैयक्तिक अंतर्द्वन्द्व को सुलझाने तथा युग-जीवन की विसंगतियाँ एवं बिडम्बनाओं के उद्घाटन का साहित्यिक प्रयास क्रमशः 'नवलेखन' का आन्दोलनकारी स्वरूप धारण किया ।
स्वाधीनता का अनुभव भारतीय साहित्यकारों तथा नागरिकों के लिए

Sunday, February 11, 2018

साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार-2017


माननीय सभाध्यक्ष महोदय, सभा में उपस्थित प्रबुद्ध साहित्यकार तथा साहित्यप्रेमीगण, आज आप लोगों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच स्वयं को पाकर गौरवान्वित और परम आह्लादित हूँ। मेरी कविता संग्रह "धरतीसँ अकास धरि" को साहित्य अकादेमी जैसी शीर्ष और प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ने 'साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार-2017" से नवाजा, इसलिये मैं साहित्य अकादेमी, निर्णायक मंडल एवं चयन प्रक्रिया में शामिल सभी व्यक्तियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। साथ हीं, आज मैं यह पुरस्कार उन सभी व्यक्तियों कों समर्पित करना चाहूँगा जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मेरी लेखन प्रक्रिया से सम्बद्ध रहे हैं अथवा सरोकार रखते हैं।


मैं क्यों लिखता हूँ, कैसे लिखता हूँ और किसके लिये लिखता हूँ? इन सभी प्रश्नों के जबाव के तौर पर मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि जब मेरे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता है, जिनके समक्ष मैं अपना मनोभाव व्यक्त कर सकूँ, किन्तु मन में उपजे विचारों की अभिव्यक्ति तत्क्षण अपरिहार्य सी लगने लगती है, तब मैं कलम उठाता हूँ, तभी मैं लिखता हूँ। चूँकि ऐसी अभिव्यक्ति

Wednesday, August 31, 2016

काव्यशास्त्रीय तत्व यथा- शिल्प-बिम्ब-प्रतीकादि लोककेँ कविताक प्रति आग्रही बनबैत छैक, मुदा लोक कविताप्रेमी ओकर कथ्यक कारणे बनैत अछि । छन्दबद्ध कि छन्दहीन, तुकान्त कि अतुकान्त कोनो प्रकारक कविता लिखैत काल कथ्यक महत्ताकेँ झूस नहि बुझबाक चाहियनि कविकेँ । शिल्पक नवीनता नहि कथ्यक समकालीनता कविताकेँ आधुनिक बनबैत छैक ।
वर्त्तमान समयमे हमरा लोकनि कथ्यसँ अधिक शिल्पक आग्रही भेल जा रहल छी । तकर एकटा पैघ उदाहरण कही जे, एकैसम शताब्दीक मैथिली कविता, कोन कविता थिक, एकर स्वर ओ स्वरूपगत वैशिष्ट्य की छैक, ताहिपर समुचित विमर्श एखनधरि नहि भेल अछि ।
आइ-काल्हि नव कविगण लिखैत छथि आ तकरा यथाशीघ्र प्रिंट वा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे हमरा सभक सोँझा परसि दैत छथि । हमहूँ सभ ताहिमेसँ काँच-कचकुह रचनाकेँ बेराय, कविकेँ 'छपास रोग'सँ ग्रसित मानि लैत छी । ई नहि सोचैत छी जे आखिर ई रोग हुनका केना धेलकनि? ई रोग एकदम्मे नव अछि वा पहिनहुँ छल? हमरा जनैत ई रोग नव नहि अछि, पहिनहुँ छल । अन्तर एतबे आयल अछि जे आब प्रकाशन सुविधाक कारणे शीघ्र प्रकाशमे आबि जाइत अछि । पहिने तरे-तर कतेको कविकेँ अकाल-काल कवलित कयने होयत !
 मुदा, एकटा कटु सत्य इहो जे एहि रोगक पहिचान भेलाक बादहु उपचार नहि ताकल जा रहल अछि । तेँ जखन हमरा लोकनि कहैत छी जे 'छपास रोग' बढ़ि गेल अछि तखन, वस्तुतः प्रकारान्तरसँ इएह मानैत छी जे हमरा सभक सम्पादकीय-समीक्षकीय सुविधा घटल अछि ।


Posted on FB 28th June 2016

Wednesday, June 22, 2016

गामक सिमान पर

'धरतीसँ अकास धरि'क बाद हमर तीन टा पद्य-संग्रह प्रकाशित भेल- अगड़म-बगड़म, सम्भावना आ बिहुँसि रहल अछि अमलतास। अगड़म-बगड़म'मे मुख्यतः हमर प्रारम्भिक कविता सभ संकलित अछि, सम्भावना हाइकू-शेनर्यू संग्रह थिक आ बिहुँसि रहल अछि अमलतास- बाल-कविता संग्रह। हमरा लेल तीनू महत्त्वपूर्ण अछि।

मुदा, प्रायः विधा-वैविध्यक कारणे एहि तीनू पोथीक प्रकाशनक अछैतो हमर (धरतीसँ अकास धरि'क पश्चातक) काव्य-यात्राक परिचय सुधि पाठक-समीक्षक लोकनिकेँ भेटब सम्भव नहि भेल। किछु शुभेच्छुक तँ शंको जनौलनि जे कदाचित् हमर कवि बाटसँ भटकि तँ नहि गेलाह?
मुदा, हम एहन प्रयोग कयल। कारण हमरा आत्मविश्वास छल जे हमर कवि अपन बाट धयनहि अछि। 

'गामक सिमान पर' हमर कविक 'धरतीसँ अकास धरि'क बादक काव्य-यात्राक एकटा पड़ाव थिक। एहि पड़ाव पर पहुंचि अपन लक्ष्यसँ कतबा निकट अथवा दूर भेलहुँ अछि, से जनबाक जिज्ञासा अपन पाठक-समीक्षकसँ अछि। हमर (पूर्वोक्त) 'आत्मविश्वास'क औचित्य सेहो एतहि फरिछायत।


Posted on FB; 20th June 2016.

बिहुँसि रहल अछि अमलतास


हाइकू'क बंगला अनुवाद

Trishna Basak-बंगला साहित्यक नव्यतम पीढ़ीक प्रतिनिधि साहित्यकार थिकीह, जनिका मैथिली भाषा-साहित्यमे विशेष रुचि छनि। एखनधरि अनेक मैथिली रचनाक बंगला-अनुवाद कयलनि अछि। हम हिनका प्रति हार्दिक आभार प्रकट करैत छी जे हमर 'सम्भावना'क २० गोट मैथिली हाइकू'क बंगला अनुवाद कयलनि आ विगत ४३ वर्षसँ प्रकाशित होमयबला एकमात्र बंगला 'अनुवाद पत्रिका' सन प्रतिष्ठित पत्रकामे प्रकाशनार्थ पठौलनि आ सौभाग्यवश शारदीय-अंकमे प्रकाशितो भेल। ई हमरा लेल विशेष आह्लादकारी एहि हेतु सेहो अछि जे पहिल बेर हमर कोनो रचनाक अन्य भाषामे अनुवाद भेल अछि



Posted on FB; 11th Jan. 2016.

भांगकधुनकीमे‬

आइ जे अंगिकाक अकादेमी, बज्जिकाक विभाग लेल कपरफोड़ी भ' रहल अछि...किओ जोलहीसँ उर्दूक खोंइछ भरय चाहैत छथि त' किओ पचपनिया'क नामपर मैथिलीक घेंटपर छप्पन छूरी भंजैत छथि...एहि सभटा फसादक बीजारोपण तहिये भ' गेल छल, जहिया (1801 इस्वीमे) एच. टी. कोलब्रुक नामक अंग्रेज 'मिथिला अपभ्रंश' अथवा 'देसिल वयना' अथवा 'तुरुतियाना'क नामकरण एकगोट सवर्ण, हिन्दू राजाक कन्याक नामपर 'मैथिली' राखि देलनि। लगैए जखन ओ एहन साम्प्रदायिक, सामन्तवादी, जातिवादी, ब्राह्मणवादी...काज क' रहल छलाह तखन शाइत कोनो सोतिपुराक दरबज्जापर बैसल हेताह!
दुर्भाग्यवश अर्सकिन पेरी, जॉन बिम्स, ग्रियर्सन सन-सन विद्वान लोकनि सेहो बिहारी डाइलेक्टक खोज करैत-करैत भोथलाय गेलाह आ अंतत: मैथिलीएक नाह चढ़ि कछेर धयलनि!
मुदा आब समय आबि गेल अछि जे बड़का -बड़का महानुभाव लोकनि जाहि काजकेँ सम्पन्न करबासँ चूकि गेलाह, तकरा हम सभ मिलिजुलि सम्पन्न करी।
आउ, आइ होलीक शुभ अवसरपर लोढ़ी-सिलौटपर हाथ राखि, भांगक किरिया खाइ जे अपन मातृभाषामे पैसल साम्प्रदायिकता, जातिवाद, सामन्तवाद, ब्राह्मणवाद...आदिकेँ समूल नष्ट करब खाहे एहि क्रममे हमरा लोकनिक भाषिक पहिचाने किएक ने लोप भ' जाय, खाहे किएक ने हमरा लोकनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक परिचितिए मटियामेट भ' जाए...!!

तँ आउ, सभ किओ मिलिक' एकटा एहन नव बिहारी भाषाक आविष्कार करी जकर आदिग्रन्थ 'वर्णरत्नाकर' नहि हो, जकर शीर्षपुरुष विद्यापति नहि होथि, जकर नाम मैथिली नहि हो, जकर कोनो इतिहास-भूगोलमे मिथिला नहि हो...आर जे हेतैक से हेतैक...हमरा लोकनिक टिकासन पर नचैत हिन्दीक आत्माकेँ अवश्य शांति भेटतैक!!!!



Posted on FB; 23rd March 2016.

नेपालमे मैथिलक उपेक्षा


नेपालमे मैथिलक उपेक्षाकेँ मात्र नेपालक आंतरिक समस्याक रूपमे नहि देखबाक चाही । भारतीय मिथिला क्षेत्रक ई सेहो एकटा पैघ समस्या अछि । आखिर हमरा सभक बेटी-रोटीक जे संबंध अछि, भनहि हम सभ दू-देशमे विभाजित भऽ गेल छी । जाहि निर्ममतासँ निर्दोष युवक, नेना आ स्त्रिगण सभक हत्या भऽ रहल अछि तकर प्रतिवाद भारतहुमे होयब आवश्यक अछि । तखने हमरा सभक परस्पर संबंध कायम रहत । मात्र भोज खयबा लेल नेपाल जायब आ विपत्तिमे अंतरराष्ट्रीय सीमाक बहन्ना कऽ बातकेँ टारब सर्वथा निन्दनीय अछि ।
नेपाली सरकार कोना ओतुका मैथिल समाजक अधिकार संविधानमे सुनिश्चित करत ताहि लेल भारतीय मिथिला क्षेत्रमे सेहो लोककेँ संवेदनशील होमय पड़त । ई मात्र क्षेत्रीय नहि राष्ट्रीय (भारतीय) गौरव ओ अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संदर्भमे सेहो भारतीय दृष्टिकोणसँ महत्तवपूर्ण विषय अछि । भारत सरकारक विदेश मंत्रालय एहि विषयमे एखन धरि विशेष प्रभावशाली नहि साबित भेल अछि । ओकर प्रभाव तखनहि नेपाल सरकारपर पड़तैक जखन भारतीय मिथिला एहि मुद्दापर दलमलित होयत ।
कहय लेल हमरा सभक कयकटा ने "अंतरराष्ट्रीय" संस्था अछि मुदा, से मात्र चन्दाक धन्धा लेल, सेहो साबित भइए गेल । तेँ आब हिनको लोकनिक भरोसे बैसब उचित नहि । ई सभ कृतघ्न ओ कोढ़ि छथि ।

नेपाली साहित्यकार-पत्रकार मित्र लोकनिसँ आग्रह जे वस्तुस्थितिसँ विस्तारमे अवगत करबैत रहथि । ध्यान रहय साहित्यकार अनिवार्यतः पत्रकार होइत अछि तेँ सभ कियो अपन धर्मक निर्वाह करी । विपत्तिक सामना एकजुट भए करी ।
Posted on FB; 21st Sept. 2015.